Friday, July 10, 2009

मॉ भैया...भैया ले आए

घर की घंटी बजी साथ साथ बहुत लोगों की । अंदर से गुड्डी दौड़ती हुई झट से दरवाजा खोली । बाहर खड़े भैया ने गुड्डी से कहा गुड्डी ये तुम्हारी भाभी हैं । गुड्डी के चेहरें पर खुशी के जगह बारह बज गए और वह फिर दोबारा जितनी तेजी से दौड़ती हुई आयी थी उतनी तेजी से वापस दौड़ती हुई मॉ के पास गयी । और मॉ से बोली मॉ भैया ... आपके लिए भैया लेके आए हैं । मॉ को कुछ समझ में नहीं आया । और वह बोली क्या बकती हैं कहती हूं टीवी कम देखा कर । तब तक भैया नये भैया के साथ घर में आ चुके थे । अंदर आकर भैया बोले मॉ ये तुम्हारी बहू हैं । अब बारी थी मॉ की । दरवाजे के घंटी की मॉ की भी घंटी बज गईं ।
जी हॉ भलें ये कहानी काल्पनिक हो । पर आनें वाले समय में ऐसा होने से इंकार नहीं किया जा सकता । वो दिन दूर नहीं जब भैया मूछ वाली भाभी लेके आए । कम से कम कोर्ट से मिलें मंजूरी के बाद तो इसके पॉजिटिव संकेत मिलते हैं । हाल में कोर्ट से मंजूरी मिलनें के बाद समलैंगिकों के हौसलें जिस तरह से मस्त हो रहें हैं उससे यहीं लगता हैं कि आनें वाले दिन में मॉ बाबूजी के हौसलें पस्त होगें । और उनके आशा पर किस तर ह पानी फिरेगा । गौरतलब हैं कि हाल में ही कोर्ट नें समलैगिंक संबंध को वैध करार दिया था । और दोनों पक्ष में आपसी रजामंदी के बाद हुई शादी को भी जायज ठहराया था । जिसके बाद देश के दर्जनों मॉ बाप के ऑखों से नींद गायब होना लाजिमी हैं ।
वैसे जहॉ तक हमारे यानी मेरे ज्ञान का संबंध हैं इसका उल्लेख काफी पुरानें ग्रथों में मिलता हैं । हालाकिं इस बात को हम यही पर छोड़ना पंसद करेंगें । क्योकिं एक तो ये पहलें से विवादित हैं ऊपर से आजकल बैसे भी मुद्दों की सख्त कमी हैं । वैसे पश्चिमी देशों में इस कुप्रथा का प्रचलन काफी दिनों से हैं । पर हमार भारत में ये नदारद तो नहीं कहेंगें पर खुलेआम नहीं होता था । जो अब होना शुरू होगा । खैर छोड़िए भी आखिर मैं आपकों कब तक अपनें बोरिंग लेखनी से चाटता रहूंगा । वैसे भी इस मामलें में मेरी मर्जी हैं । झेलना आपकों है । झेलना हैं तो झेलिए नहीं तो कोई और ब्लाग के तरफ रूख कीजिए ।
बाकी अंत में एक चीज जरूर कहूंगा अबहीं अगर छोटी अवधि के लिए देखा जाए तो इसका बहुत फायदा हैं । सबसे पहिले कि आबादी नहीं बढेगी। जितना भी बुआई कीजिए फसल उतना ही रहेंगा । दुसरा फायदा ये कि शादी बियाह का खर्च कम हो जाएगा ।
लेकिन इसकों अपनाने से पहिले ये सोचना होगा कि मॉ बाप के सपनें को क्या हम ऐसे ही अपनें स्वार्थ के चलते कुचलतें रहेंगें । क्या हम प्रकृति से ऐसे ही पंगा लेते रहेंगें और हम सबकी प्यारी दुलारी धरती को सर्वनाश के तरफ ले जाएगें । अगर हमारा जवाब हैं तो फिर तो दीवाल में अपना माथा अपनें से मारनें वाली बात हो गयी । अगर जवाब नहीं हैं तो फिर हमें इसकें खिलाफ एकजुट होना चाहिए और इसका मुकाबला हमलावर तरीके से करना चाहिए ।
अभी मेरे दलान से बस इतना हीं क्योकिं सुबह के साढ़ें तीन बज गए हैं और मुझे काम करना हैं ।

महंगाई मार गई ...

आज से लगभग २५ बरस पहिले जानी बाबू कि बहुते उम्दा कव्वाली आयी थी । जिसका बोल था ... बाकी जो बचा वो महंगाई मार गयी। जी हॉ बोल आज से लगभग पचीस बरस पहले आईं थी और उस समय के हिसाब से बिल्कुल सटीक थी पर आज के समय ये थोड़ा बदल गया हैं । अब अगर हम यह कहें कि पहलें महंगाई मार गई बाकी बचनें पर कुछ और मार गई ।
अबही कुछ दिन पहलें तीन से जादे के अंतराल पर अपनें गांव गया था । वहॉ जा कर बहुत बदलाव देखने को मिला चार रुपयें किलो भिंडी पर लोग रो रहें थे और कह रहें थें कि भैया सब्जी बहुत महंगा हो गया हैं हम तो बिल्कुल मर जाएंगे। तो कोई कह रहा था दादा अब पहलें वाली बात कहा देखिये कितना महंगाई बढ़ गया हैं । ये तो रहीं गांव की बात । अब जरा शहर की बात करतें हैं । नोएडा मैं अकेले रहता हूं । अरे भाई अभी माया जाल से आजाद हूं । यहॉ आपको बता दूं कि ना तो मायावती का समर्थक हू ना ही बसपा का । और ना ही मैडम नें मुझपे कोई जाल फेंका हैं जिसमें मैं फंस गया हू । मैं दुनिया दारी वाली माया जाल की बात कर रहा हूं । हॉ तो बात को आगे बढ़ाते हैं । यहॉ पर आ के मैंने देखा कि वही भिडीं ४० रुपये किलो मिल रहीं है । मै असहाय क्या करता सिवाय उसे खरीदनें के ।
और उसे खरीदनें के बाद एक बार फिर मेरे मन वही पहिलें वाला ख्याल आया कि सबसे पहिले महंगाई मार गइल बाकी जो बचा तो फिर किसी और चीज का नम्बर ...
अबहीं कि बातें सिर्फ यहीं तक आगे का सफर जारी रहेगा जब तक मॉ भवानी कि कृपा होगी ।
फिलहाल आपका अदना सा पत्रकार