Wednesday, November 17, 2010

कोशिश करने वालों की » रचनाकार: हरिवंशराय बच्चन

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो,
नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

Wednesday, March 10, 2010

लाशों के ढेर पर राजनीति का जश्न




मनगढ़ के इस र्ददनाक कांड के बाद तो जैसे राजनेताओं की चांदी ही हो गई। जिसको देखो बस मनगढ़ का ही राग आलाप रहा है। हादसे के बाद नेताओं का मनगढ़ दौरे का तांता लग गया, विधायक राजा भैया, सांसद रानी रत्ना सिंह, समेत कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी, सपा सांसद अखिलेश यादव, प्रदेश के लोकनिर्माण मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी तथा पंचायतीराज मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने भी पहुंच कर शिरकत की और मीडिया का बाइट देने से परहेज न करते हुये अपनी राजनीति की रोटी सेकते नजर आये। किसी नेता ने पीड़ित परिवार तक जाने की जरूरत नहीं समझी सिर्फ घटनास्थल पर पहुंच कर अपना एक बयान जारी कर चलते बने।
तृणमूल कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी सांसद डा.काकुली घोष तो इसी बहाने पहली बार उत्तर प्रदेश में आयी और सिर्फ कृपालु जी के अस्पताल का मुआयना करके एक प्रेस नोट बांटकर घटनास्थल से चलती बनी। गरीबों की मसीहा कहे जाने वाली ममता बनर्जी का प्रतिनिधी बनकर उन्होंने मृतकों और घायलों के परिजनों से मिलना भी उचित नहीं समझा, मिलना तो दूर वह घटनास्थल तक भी नहीं गई। उनकी गाड़ी पर लदी फूल-मालाएं देखकर साफ लग रहा था कि लखनऊ में उनका जोरदार स्वागत किया गया है जैसे वह किसी चुनावी सभा को संबोधित करने आई हो साफ जाहिर है कि वो लाशों के ढेर पर राजनीति का जश्न मनाने आई है। जबकि मनगढ़ में उनकी मौजूदगी के समय मृतकों का अंतिम संस्कार मानिकपुर घाट पर किया जा रहा था, मगर किसी ने भी घाट पर जाकर पीड़ित परिवार से मिलना उचित नहीं समझा और सिर्फ मीडिया के सामने सरकार से दो लाख रूपये का मुआवजा दिलाये जाने की सिफारिश करने की ही बात कहकर चलती बनी। वापस लखनऊ पहुंचकर उन्होंने आनन-फानन में एक संवाददाता सम्मेलन चारबाग रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मैनेजर के कमरे में आयोजित किया और संवाददाताओं को चाय नाश्ता का इंतजाम तक एसएम अमिताभ कुमार को ही कराना पड़ा। जबकि एक तरफ ममता बनर्जी रेल मंत्री होते हुये भी रेलवे की सुविधाओं का कम से कम इस्तेमाल करने से परहेज करती है वही दूसरी तरफ उनके प्रतिनिधि इसका पूरा पूरा लाभ लेने में मस्त है।
भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी कम नहीं निकले वह घटनास्थल पर आकर अपनी अलग राजनीति करने से बाज नहीं आए उन्होंने कृपालु महाराज को क्लीन चिट भी दे डाली है। राजनाथ ने कहा, इसके लिए गरीबी और महंगाई जिम्मेदार है। बाबा की मंशा बिल्कुल ठीक थी। पत्थर की मूर्तियों और पार्को पर सैकडों करोड़ रूपए बहाने वाली मायावती सरकार के पास मुआवजा देने के लिए पैसा नहीं है। उधर प्रदेश की मुखिया मायावती ने एक बयान जारी कर कहा है कि राज्य में वित्तीय संकट चल रहा है और सरकार इस स्थिति में नहीं है कि प्रतापगढ हादसे में मारे गए लोगों के परिवार वालों को वित्तीय मदद दे सके। सरकार की ओर से जारी एक प्रेस बयान में कहा गया है कि राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से खुले दिन से मुआवजा देने की अपील की है। प्रेस बयान में आगे कहा गया है, ‘अगर केंद्र सरकार मुआवजा देने में अपनी असमर्थता जताती है तब राज्य सरकार अपने संसाधनों से इस काम के लिए कोष इकट्ठा करेगी।’ मायावती का कहना है कि केंद्र राज्यों को कभी भी मानवीय आपदाओं के लिए धन मुहैया नहीं कराता, बल्कि वो केवल प्राकृतिक आपदाओं के लिए धन देती है। उन्होंने सफाई देते हुए कहा है, ‘इसलिए मैंने अपनी पार्टी के सभी सांसदों से कहा है कि वो प्रधानमंत्री से मुआवजे के लिए आग्रह करें और इस तरह के मानवीय त्रासदियों के लिए धन जुटाने के लिए एक केंद्रीय कोष के गठन की मांग करें।’
हालाँकि उनका कहना था कि फिलाहल स्थानीय प्रशासन को आवश्यक निर्देश जारी कर दिए गए हैं ताकि सभी जरूरी सहायता जारी रखी जा सके। दूसरी तरफ दिल्ली में बैठे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लोकसभा में कहा, ‘हमने फैसला किया है कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष के तहत मारे जाने वालों के परिजनों को दो-दो लाख रुपए जबकि बुरी तरह से घायलों को 50-50 हजार रुपए बतौर मुआवजा दिए जाए।

Sunday, January 10, 2010

मेरी वापसी...

बहुत दिनों बाद आज लिखने का मौका मिला हैं। लगभग एक माह दस दिन बाद आधा स्वस्थ हो के लौटा हूं। 22 दिन लगातार बुखार में था । सालों बाद काफी दिन एंकात में और सुकून से बिताने का मौका मिला। तबीयत खराब होने के बावजूद सुकून इसलिए कहूंगा क्योकिं वहां रोजमर्रा की न्यूज रूम की गतिविधि और राजनीति से एकदम दूर था। यहां तक कि मैनें अपना फोन भी स्विच ऑफ कर दिया था । किसी से कोई संपर्क नहीं। एकदम दूर । कभी कभार मन होता था तो साइबर कैफे चला गया अन्यथा घर में हीं आराम करता था। सुबह की दिनचर्या आठ नौ बजे से शुरू होती थी, जो यहां रहते हुए इससे पहले हुआ करता था। सुबह की शिफ्ट के लिए या यूं कहे कोई भी शिफ्ट होने के बावजूद सुबह सात बजे के आसपास नींद खुल ही जाती थी । और ये सिलसिला फिर अभी भी यहां आने के बाद शुरू हो गया । बाकी घर पर रहने पर नित्य कर्म करने के बाद शुरू होती गहन ध्यान और अपने भविष्य के प्रति गंभीर और चिंतन करने की प्रकिया। ये प्रकिया लगभग पूरे छुट्टी भर चला । बहुत दिनों बाद मन मस्तिष्क को इतना आराम मिला था। इस एक महीने भर में बहुत सारे मुद्दे पर लिखने का मन किया । बहुत सारी चीजे देखने को मिली जिस पर तुलनात्मक तौर पर लिखने का मन किया । फिलहाल वापस लौटा हूं धीरे धीरे करके सभी चीजों और मुद्दों पर लिखूंगा।