Monday, August 22, 2011

आज का din

रोजाना की तरह आज भी हजरतगंज स्थित जीपीओ गया । क्या बूढ़े क्या बच्चे हर कोई अन्ना अन्ना और वंदे मातरम के नारा लगा रहे थे । एक सज्जन ने मुझसे पूछा कि भाई आजकल दिग्गी राजा नजर नहीं आ रहे हैं । मैनें कहा भाई अभी वह बिल में छुप कर बैठे हुए है। क्योकि जनता का सब्र कभी भी टूट सकता है । अभी तो वह मध्य प्रदेश से धकियाए गए है । जल्दी लतियाए भी जाएगें। क्यों मैने सही कहा ना । आपकी क्या राय है...

जरा इनसे मिलिए ...

अन्ना के आंदोलन में एक बार फिर नेता अपनी रोटी सेकने लगे है । आज एक अपने आप को
उत्तर भारतीयों का रहनुमा बताने वाले दबंग नेताजी भी अन्ना के समर्थन में कूद पड़े । आपको बता दूं कि ये नेताजी अभी कुछ दिन पहिले आजतक पर अन्ना को खूब गरिया रहे थे । ये नेता जी मुंबई में कहां घुस गए थे जब उत्तर भारत के लोगों पर राज ठाकरे के गुड़ें लगातार हमला कर रहे थे । दरअसल कांग्रेस के नेताओं को लग गया है कि ये आम आदमी अब खास हो गई है । और अगर ये बौरा गई तो उनको पीटने में भी आम आदमी को टाइम नहीं लगेगा ।

Thursday, August 18, 2011


जरा गौर फरमाइए

कल कांग्रेस के एक महाशय ने बयान दिया कि अन्ना को अमेरिका समर्थन दे रहा है । इससे दो बाते साफ होती हैं । एक तो यह कि ये महाशय कितने संवेदनशील है । और दूसरी कि इनके घर कोई बच्चा भी पैदा होगा तो पड़ोसी देश का नाम लेगें । अपने पड़ोसी मुल्क के भी कुछ लोग हर किसी बात पर अमेरिका पर दोषारोपण करते हैं । इन महाशय को अभी आम आदमी के ताकत का अंदाजा नही हो सका है । इसलिए कांग्रेस पार्टी को चाहिए कि ऐसे नेताओं को सरकारी खर्च पर पागलखाने भेज कर इलाज करवाना चाहिए । क्या राय हैं आपकी ...

Monday, June 6, 2011

फिर याद आया जलियांवाला बाग




दिल्ली में रामलीला मैदान में जो कुछ हुआ उससे एक बार फिर इतिहास के पन्ने अपने आप पलट गए । पांच जून की मध्य रात्रि भारतीय इतिहास में काली स्याह से लिखी जाएगी । जब स्कूल में था तब जलियांवाला बाग की सच्चाई पढ़ाई गई थी । इस घटना को जानने के बाद बालमन में यही विचार आया था कि क्या कोई ऐसा भी कर सकता है । अगर आप इतिहास पढेगें तो देखेगें हर जगह अंग्रेजो के जुल्म कि दास्तां बयां की गई है । और कैसे उनसे हमारे क्रांतिकारी लोहा लेते दिखे है । दिल्ली की रामलीला मैदान ने वो पन्ना एक बार फिर खोल दिया ।
रविवार का दिन सो कर थोड़ा लेट उठा । उठकर सीधे टीवी खोला सोचा देखू देश दुनिया का क्या हाल है। न्यूज चैनल पर लॉग करते ही । दूसरे जलियांवाला बाग की जानकारी मिली । देखा कि आजाद देश के सरकार ने कैसे एक बार फिर सच को कुचला है । एक बार फिर व्यवस्था परिवर्त्तन के खिलाफ दमन किया गया है । पहले हमने अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ी । अब अपने ही लोगों के खिलाफ लड़ रहे है । जिनको रक्षक बनाया क्या पता था वही भक्षक बन जाएगें । जो जनता के सेवक है । वो अपने मालिक को ही कांट खा बैठेगें । क्या पता था आस्तीन का सांप पाल रहे है ।
आखिर कार आधी रात को ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी जो ऐसा किया । इसमें दिल्ली के कमिश्नर ने भी स्वीकार किया मेरे आदेश से नही बल्कि उपर से आदेश आया है और प्रेशर है । लेकिन बाद में अपने बयान से मुकर भी गए । अगर यही सब करना था तो सुबह इंतजार क्यों नही किया । कहीं बाबा को वही भीड़ में मारने की साजिश तो नही थी । लेकिन बाबा के भक्तों ने सूझबूझ से काम लिया । इतना भीड़ होने के बावजूद भी खून की नदियां बहते बहते बच गई ।
आखिर बाबा ने क्या गलती की - क्या काले धन के बारे में पूछना गलती है । क्या भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कहना गुनाह है । इस निकम्मी सरकार को जानना चाहिए कि ये उसका निकम्मापन और नकारापन ही है जिसने बाबा रामदेव को ऐसा करने के लिए मजूबर किया । खैर इसी बहाने पीएम साहब की भी पोल खुली और गांधी परिवार की भी । ईमानदारी का चोला बहुत पहन लिया । अब ईमानदारी शब्द को ज्यादा बदनाम नही करना चाहिए । अगर इतने ही ईमानदार हैं तो क्यू कर रहे है ये सब । चलिए मान लेते है एक रिमोट कंट्रोल है । तो संचालित हो रहे है । इस रिमोट कंट्रोल से । क्यूं नही इस्तीफा दे देते अपने पद से ।
सरकार भूल गई ही ये वही जनता है । जिसने इंदिरा गांधी जैसे कद्दावर नेता की जमानत जब्त करवा दी थी।
सत्ता के नशे में चूर लोगों को अभी इसका अहसास नही हो रहा है । लेकिन चुनाव हारने के बाद खुद ब खुद समझ जाएगे । सरकार एक के बाद एक घोटाले करती रहे । और जनता कुछ बोले भी ना । वाह भाई वाह ये कहां कि नियम है । क्या इस देश में अब बोलने का भी अधिकार नही है । लोगो को । वैसे बाबा ने एक सराहनीय काम किया है । और ये एक अच्छा मौका है एकजुट होने का और व्यवस्था परिवर्त्तन करने का ।
कहां है अब कांग्रेस के तथाकथित युवराज । अब तो उनके सरकार ने ये सब किया है । बात बात में नाटक करना तो कोई उनसे सीखे । बिना मुद्दा के नाटक करते रहते है । अब आएं सामने । आखिर कहां है वो क्यो नही अपनी सरकार के खिलाफ बिगुल बजा रहे है । क्यो नही करप्सन और काला धन पर अनशन कर रहे है । क्यों नही इस पर उनके चाटुकार लोग उनके लिए पटकथा लिख रहे है । सीधी सी बात है । ये सब उन्ही के इशारे पर हुआ है । जनता को बहुत बेवकूफ बना चुके और हम बहुत बेवकूफ बन चुके । लोगों में जागृति हो रही है । लोग जाग रहे है । और जिस दिन हर नागरिक जाग गया । उस दिन फिर जगह ढूढंने से भी नही मिलेगा । जरा एक हताश और निराश नेता पर गौर फरमाइए जो ओसामा को ओसामा जी कह कर बुलाते है । कभी इनके भी ठाठ थे । मुख्यमंत्री रहे है दस साल । लेकिन जनता ने ऐसा पटका कि आज उस प्रदेश को छोड़ दिया है । ऐसे तो मुख्यमंत्री है साहब । अभी मुस्लमानों की राजनीति कर रहे है। आपको याद तो होगा ही भट्टा परसौल । कितना नाटक किया था वहां पर । इनके बारे में कुछ भी बोलना अपना मुंह खराब करना है । इसी लिए इनके लिए बस इतना ही ।
आपको बता दूं कि स्विस बैकं ये हताश और निराश मुख्यमंत्री का अच्छा खासा पैसा जमा है । गांधी परिवार के स्विस एकांउट के बारे में बताने की जरूरत तो है नही । एक बार राजीव जी का नाम टॉप पैसा जमा करने वालों में आया था ।
बाबा ने एक बार फिर लोगों के मन में अलख जगा दी है । एक बार फिर लोग सरकार के खिलाफ एक जुट हो रहे है। अबकी बार भी एक विदेशी है । और कुछ भेड़ियें चाटुकार ।

Saturday, June 4, 2011

आइए इनका समर्थन करके कुछ अच्छा करें


बाबा ने आखिरकार अपना अनशन शुरू किया । सभी न्यूज चैनलों में बाबा छाए हुए है । कोई बाबा के खिलाफ बोल रहा हैं । तो कोई बाबा के पक्ष में । चाहे कुछ भी हो बाबा ने जन जागृति का अभियान तो छेड़ ही दिया है । कोई कुछ भी कहे लेकिन हम बाबा को सपोर्ट करते है और आप सभी पाठकों से गुजारिश ही है कि आप भी बाबा को कुछ नही तो समर्थन जरूर दे । और एक बात बाबा का ये अनशन व्यवस्था परिव्रतन के लिए है ना सरकार परिवर्त्तन के लिए । आपको बता दूं कि काला धन का मुद्दा उठाने वाले बाबा ही है । और बाबा के अभियान के वजह से ही आज काला धन पर लोगों में जागरूकता आयी हैं । कम से कम एक व्यवस्था में सुधार का माहौल तो बना हैं ।

Thursday, May 19, 2011

Is Rs. 20 sufficient per day ???



I read this article in TOI , Surat edition on 12 May 2011. It was not just a shock for me but also showed the truth that how these policy makers fool the common men and act as opportunists.

Wednesday, May 11, 2011

अजी सुनिए तो ...

भ्रष्टाचार करने वाले ही इसको रोकेगें । जी हैं सुनने में थोड़ा अटपटा जरूर लगता हैं । लेकिन ये सच्चाई हैं और हमें इसे स्वीकार करना होगा । उदाहरण के तौर देखिए आज के सबसे चर्चित चेहरे और जाबांज लोकतंत्र खिलाड़ी शरद पवार । भ्रष्टों की लिस्ट में नंबर एक । राजा साहब अरे भाई टेलीकॉम वाले राजा साहब को तो भूले नहीं हैं । वैसे अपने बड़बोले राजा साहब भी कम थोड़े ना हैं । उ भी कभी मुख्यमंत्री हुआ करते थे । क्या ठाठ थी भई उनकी । बुरा वक्त आने पर आदमी कैसे अर्नगल बोलता हैं । ये कोई उनसे सीखे । उनको देख के और सुनके कोई विश्वास नहीं करेगा वो कितने बड़े भ्रष्ट है । दस साल में मध्य प्रदेश को खाली बीमारू राज्य ही नहीं बनाया बल्कि 100 साल पीछे भी धकेल दिया । उनकी वीरगाथा की और किस्से सुनिये । दस साल प्रदेश की तो मारी ही मारी । बाकी में बुरी तरह हारने के बाद प्रदेश की राजनीति ही छोड़ दी । और चल दिए दसरे ठिकाने की ओर फिलहाल राजा साहब उत्तर प्रदेश के प्रभारी बन बैठे हैं । और देश के तथाकथित युवराज के चमचे नबर वन । खैर इसमें उनकी भी गलती नहीं हैं । आदत धीरे धीरे जाती हैं । बहरहाल हम लोग भ्रष्टाचार पर बात कर रहे थे । वैसे स्विस में पैसा जमा करने में राजा साहब शीर्ष भारतियों में आते है । सरकार नें अभी एक कमेटी बनायी हैं । जो लोकपाल बिल के बारे में पार्टी करेगें । वैसे भी मीटिंग अनसीरियस लोगों के लिए एक पार्टी के तरह ही होती हैं ।

Wednesday, April 20, 2011

हम बेशर्म हैं

राजधानी एक्सप्रेस में लगी आग में जान बचानी की कीमत मात्र तीन हजार रूपये...और विश्व कप के लिए करोड़ों रूपये ऐसे ही चलता रहा तो समाज सवेंदनहीन क्यों नहीं होगा क्यों लोग अपनी जान को खतरे डालेगें ये भी कह सकते हैं कि मानवता हैं पर जब कोई जवान शहीद होता हैं तब कहां घुस जाती हैं मानवता जवाब किसी के पास नहीं हैं क्योकिं एसी कमरे में बकबक करना और अमलीजामा पहनाना अंतर होता हैं आप क्या कहेगें क्योकिं भविष्य हैं आपका भले देश को आप अपना ना मानते हों...
आपको बताते चलूं कि अगर कोई जवान शहीद होता हैं तो उस जवान के घर वालों को महज लाख रूपये दे दिए जाते हैं उस समय कहां चला जाता हैं बीसीसीआई कहां घर में दुबक के भाग जाते हैं वो लोग जो खिलाड़ियों को करोड़ो रूपये देने की वकालत तो करते हैं पर ये सब चीजें उन्हें दिखाई नहीं देती हैं आज तमाम शहीद परिवार ऐसे ही जिन्हे दो वक्त की रोटी भी मुहाल हैं शहीद जवानों के बुजुर्ग माता पिता भीख तक मागंने तक मजबूर हैं तब कहा चले जाते हैं हमारे मान्यवर किसे के पास कोई जवाब नहीं हैं क्योकि यहां जान बहुत सस्ती हैं

Wednesday, April 6, 2011

दिलीप ,भूमिका, विक्रम, आलोक,एवं तेजिंदर को सिम्‍मी मरवाहा सम्‍मान


तुमने जिन पौधों को रोपा, फूले और फलेंगे, पत्रकारिता की वेदी पर सौ-सौ सूर्य ढलेंगे। दिवंगत कवि पांडे आशुतोष की इन पंक्तियों को पढ़ते हुए पत्रकार सिम्मी मरवाहा को रविवार को याद किया गया। सिम्मी मरवाहा मेमोरियल चैरीटेबल ट्रस्ट द्वारा चंडीगढ़ प्रेस क्‍लब में आयोजित किए गए 8वें पत्रकार सम्मान दिवस के दौरान प्रिंट व ई-मीडिया के क्षेत्र में कार्यरत चार पत्रकारों को ये सम्मान प्रदान किया गया।
सम्मान पाने वालों में मध्‍य प्रदेश (भोपाल) से प्रकाशित पीपुल्स समाचार की विशेष संवादाता भूमिका कलम, छायाकारों में इंडियन एक्सप्रेस चंडीगढ़ में कार्यरत विक्रम जॉय, इंगलिश प्रिंट मीडिया द पॉयनीयर, चंडीगढ़ में कार्यरत आलोक सिंह एवं पहली बार शुरू की गई ई जर्नालिज्म श्रृंखला में दरबारीलाल डॉट कॉम के एमडी दिलीप झा, नोएडा तथा पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ से मॉस कम्‍यूनिकेशन पत्राचार के टॉपर तेजिंदर सिंह लूथरा, दिल्ली शामिल हैं।
इस दौरान मौजूद कवि सुशील बंसल, मनजीत कौर मोहाली, जोगिंदर सिंह जग्‍गा, थापर अंबाला, मनजीत सिंह गिल, जी के नंदा, सुशील हसरत नरेलवी, उर्मिल कौशिक ने अपनी रचनाए पेश कर सिम्मी को याद किया। ट्रस्ट की प्रबंध न्यासी कवियत्री राजिंदर रोज़ी ने सिम्मी के जीवन पर प्रकाश डाला। ज्ञात हो कि सिम्मी का मार्च 2003 में चंडीगढ़ में हुए सड़क हादसे में निधन हो गया था। इस अवसर पर पूर्व पार्षद मनजीत कौर सैणी, गोल्डन पब्लिक स्कूल मोहाली के डायरेक्टर पूर्व कर्नल सीएस बावा, सिटीजन अवेयरनेस ग्रुप के चेयरमैन सुरिंदर वर्मा, पूर्व डिप्टी डायरेक्टर पीएसईबी अमरजीत कौर पसरीचा मौजूद थे।

Wednesday, March 16, 2011

क्या किसी को दोगला कहना बुरा हैं

अभी जल्दी मैंने एक लेख लिखा हैं । इस लेख में मैनें एक सज्जन को दोगला कहके सम्बोधित किया था । मेरा ये लेख इन्हीं के आगे पीछे घूमता फिरता हैं । बहरहाल ये लेख मैनें अपने बहुत अजीज मित्र को पढ़ने कि लिए भेजा । बात दोगलापन पर आकर रूक गया । वे मुझे मीडिया इथिक्स पर लाके पटक दिए । भाई बात तो बिल्कुल सही हैं । अपशब्दों का प्रयोग करना कतई उचित नहीं हैं । मैनें उनसे पूरी तरह सहमत हूं । लेकिन क्या कोई मुझे समझाएगा कि अगर दोगलई करना अनुचित नहीं हैं । तो इसे बोलना और उस इंसान को सम्बोधन करना क्यों बुरा हैं । उस समय कहा घुस जाता हैं इथीक्स और नैतिकता । जब एक बेरोजगार संघर्ष कर रहे युवक को ये दलाल टाइप के लोग नौकरी देने के नाम पर चमचई करवाना पसंद करते हैं । और लड़कियों को लालच और भूखे नजरों से देखते हैं । उस लड़की का इज्जत तार तार करने के लिए हमेशा प्रयासशील रहते हैं । और अंत में ये लड़की या तो नौकरी से आस छोड़ देती हैं । या फिर समझौता कर लेती हैं ।
आखिर कब तक चुप रहेंगें और खामोश रहेगें हम । आखिर कब तक ऐसे ही दलालों के हाथों लुटती रहेगी अस्मत ।
हां कोई जवाब इसका किसी के पास । नहीं होगा । क्योंकि साफ हैं हम विरोध नहीं करते हैं । और कहते जो हो रहा हैं होने दो । लेकिन आखिर कब तक ऐसा ही चलता रहेगा । आखिर कब तक सिस्टम के हाथो परेशान होकर सुसाइड करेगें युवा ।
एक बड़ा सवाल हैं । सिस्टम को बदलना होगा ।
और दोगलों को उनकी औकात बतानी होगी । तभी जाके सुराज की स्थापना सहीं मायने में सिद्ध होगा ।
ज्वाला जलती रहेगी ...

Thursday, March 3, 2011

समय का पहिया

कहते हैं समय बीतने का पता नहीं चलता हैं । पुराना साल बीता । नहीं पता पता चला । इस साल के दो महीनें बीत गये । पता नहीं चला । लगता हैं कि कल की बात तो थी । जब हम नये साल का स्वागत कर रहे थे । पर क्या समय ना तो किसी के कहने से रूकता हैं । और नहीं किसी के कहने से चलता है । वहीं दूसरी ओर मौत और जिंदगी जब तलक रहनी होती हैं । तब तलक रहती है । इसलिए कहते है कि समय सबसे ज्यादा बलवान होता हैं ।

Friday, February 25, 2011

सूरत के किस्सा हमरा संग

दिल्ली छोड़ि कअ सूरत आबि गेलहुं।लगभग एक सप्ताह सूरत में रहि चुकल छि । एतेक दिन सअ सभक मुहं सअ गुजरात के बारे में खूब सुनले रहल छलहुं ।मुदा एखन तक गुजरात आबि के मौका हाथ नय लागल छल । तय द्वारे ई बेर जेना गुजरात से एकटा ऑफर आएल । हम मौन मे कलहुं कि ई बेर गुजरात घुमि के आबि छि । कियाक बूढ़ सब कह गेल छथिन्ह कि जतेक बाहर घूम बअ फिरब् ओतेक अनुभव हेतअ। ओनाय हुं दिल्ली लखनऊ रांची और पटना के अलावा दोसर दिशा में कयहों नय गेला पार लागल अछि। मुदा ई बेर हम कलहुं कि नय देश भ्रमण जरूर करबाक चाहि । ओनाय हुं एखन बेरोजगार छलहुं।
ट्रेन जखने गुजरात के सीमा में प्रवेश केलक तखने लागल कि किछु बदलाव भेला । कियाक अपना सभ के तरफ त स्टेशन सब कतेक गंदा रहिय छय । ई कोनों कहअ के बात अछि । एतुका स्टेशन सभ एतेक साफ सुथरा छय कि मौन हेत कि एतेय सुति रहि । रस्ता में गोधरा से हो आएल छल । गोधरा पहुंचल पर 2002 याद आबि गेल । बाद बाकिं हमर ट्रेन राति में साढ़े दस बजे सूरत पहुंचल । राति में सूरत स्टेशन पर संगी सभ आबि गेल छल । खेनाय नय खेने छलहुं । ओनायहों गुजराति खेनाय के बारे में बडड् सुनले छलहुं । मौन में तअ गुजराति खाना के स्वाद अबैत रहां । संगी सभ से हो ई हां गप्प कहला कि चलु गुजरात में शुरूआती एतुका खेनाय सअ करू । हमहुं तपाक सअ हां कहि देलहुं । देरी नय करवाक चाहि । चौबीस घंटा सअ ट्रेन में बैसल बैसल मौन से हो बैचेन भअ गेल छलाह । सामने गुजराती थाली लगावल गेल । सभ पहिले एक चम्मच छोला मुंह में देलउं । मौन भेल कि तुरंत फेकि दी । मुदा अन्न रहिय । कि करतउं । छोला जे रहिय से पूरा मीठ्ठ । आई तक हम खाली मसाला वला छोला खेने रहलउं । ई त नया स्वादक अनुभव रहय हमरा खातिर । गुजरात में अहांक खाना सभ मिरचाई के जगह चीनी आउरी गुड़ मिलाएल जाएत अछि । मुदा आबि हमरो आदत भअ गेल अछि ।
त एहन रहेय गुजरातक पहिल दिन । गुजरात के बारे में अउरों बडड् गप्प अछि जेना जेना काज स् फुरसत भेटत तेना तेना लिखब ।
आगाक किस्सा जारी रहत...अहांक दिलीप झा

Thursday, February 24, 2011

ये स्टार वाले बौरा गए हैं


जी हां लगता हैं स्टार न्यूज़ वाले बौरा गए हैं । कल स्टार न्यूज देख रहा था । ऐसा लगा मानों स्टार न्यूज - आपको रखे आगे ना हो बल्कि स्टार न्यूज - कांग्रेस का मुख पत्र हो । खबरें चाहे कॉमन वेल्थ से जुड़ी हुई हो या फिर बाबा रामदेव से । हर खबर को देखने के बाद ऐसा लगा मानो कोई कांग्रेस का प्रवक्ता अपनी बात रख रहा हो। देश के नंबर दो चैनल से ऐसी उम्मीद तो कोई नहीं रखता हैं । कहा गया हैं मीडिया समाज का दर्पण होता हैं । लेकिन अगर दर्पण ऐसा होता हैं तो फिर दर्पण को साफ करनें की जरूरत हैं । हर तरफ पेड न्यूज का हल्ला हैं । एसी रूम में बैठकर ना जाने जाने क्या भाषम देते हैं । फिर अगले सेकेंड ही शुरू हो जाता हैं पेड न्यूज का खेल । अब ये पेज न्यूज था । या फिर सरकार को खुश करने की कोशिश । ये तो स्टार न्यूज ही जानें । पर एक दर्शक तो खूब समझता हैं । इन चीजों को । मगर बेचारा दर्शक भी करे तो क्या करे । सबको पता हैं । इस लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र की अवाज की कितनी कमजोर है ।

अग्निपथ - हरिवंश राय बच्चन

वृक्ष हों भले खड़े,

हों घने हों बड़े,

एक पत्र छांह भी,

मांग मत, मांग मत, मांग मत,

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ


तू न थकेगा कभी,

तू न रुकेगा कभी,

तू न मुड़ेगा कभी,

कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ


यह महान दृश्य है,

चल रहा मनुष्य है,

अश्रु श्वेत रक्त से,

लथपथ लथपथ लथपथ,

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ-

-- हरिवंश राय बच्चन

Wednesday, February 23, 2011

सूरत ---- २

सूरत आए हुए लगभग एक सप्ताह हो चुका है । इन दिनों में सूरत को थोड़ा बहुत देखा । बाकी काफी व्यस्त रहा इन दिनों । वहीं बहुत दिनों बाद ऑफिस जाने लगा दोबारा । काफी दिनों से खाली बैठा था । शायद ये अच्छा ही था । क्योकिं नौकरी ढूढंने का मुझे कोई अनुभव नहीं था । वो अब हुआ । चलो जो हुआ अच्छा ही हुआ । देर आए दुरूस्त आए । दोबारा वहीं ऑफिस ऑफिस । और वहीं मीटिंग मीटिंग का खेल । पुराने दिनों में एक बार फिर वापसी हुई । पुराने साल की बात करे तो वह खाली मेरे लिए ही नहीं अपितु पूरे देश के लिए खलबली वाला था । पूरा साल झंझावतों से झूलता रहा । लेकिन क्या ये साली जिन्दगी हैं । कोई क्या कर सकता हैं इसमें भला । सब ऊपर वाले की मर्जी है भाई
आगे की कहानी ... जारी रहेगी

Monday, February 21, 2011

सूरत -१


अभी कुछ दिन पहले सूरत आया हूं जैसा सुना था वैसा ही पाया हूं मोदी का समर्थक हूं पर अब ये और बढ़ गई क्या हिदूं या फिर मुस्लमान सभी लोग मोदी के प्रशंसक हैं और हो भी क्यो ना मोटा भाई नें काम ही ऐसा किया हैं लोगों का मानना हैं यहां तक की मैं भी मान रहा हूं यहां पर एक सप्ताह बिताने के बाद भाई रात के ११ बजे भी सूरत में क्या पुरूष क्या महिलाएं सभी लोग बेफ्रिक होके घूमते नजर आते हैं जो ना दिल्ली में देखा ना हीं लखनऊ में लेकिन यहां पर देखा एक आम आदमी के नजरिए से देखे तो ये भी बहुत बड़ी बात हैं रोटी , कपड़ा और मकान के बाद अगर किसी चीज की जरूरत होती हैं तो वो हैं सुरक्षा की। जॉन मास्लो ने भी यही कहा हैं । अपनी हिरारकी थ्योरी में ।
आगे की कहानी ... जारी रहेगी

वापसी

बहुत दिनों बाद आज लिखने का मौका मिला हैं । एक तो सिस्टम की कमी दूसरा हिन्दी फोंट की दिक्कत । पर अब लगता हैं कि लिखने का सिलसिला हमेशा जारी रहेगा ।

Saturday, February 19, 2011

समझौतों की भीड़-भाड़ में सबसे रिश्ता टूट गया

समझौतों की भीड़-भाड़ में सबसे रिश्ता टूट गया
इतने घुटने टेके हमने आख़िर घुटना टूट गया

देख शिकारी तेरे कारन एक परिन्दा टूट गया
पत्थर का तो कुछ नहीं बिगड़ा लेकिन शीशा टूट गया

घर का बोझ उठाने वाले बचपन की तक़दीर पूछ
बच्चा घर से काम पे निकला और खिलौना टूट गया

किसको फ़ुर्सत इस दुनिया में ग़म की कहानी पढ़ने की
सूनी कलाई देखके लेकिन चूड़ी वाला टूट गया

ये मंज़र भी देखे हमने इस दुनिया के मेले में
टूटा-फूटा नाच रहा है, अच्छा ख़ासा टूट गया

पेट की ख़ातिर फ़ुटपाथों पर बेच रहा हूँ तसवीरें
मैं क्या जानूँ रोज़ा है या मेरा रोज़ा टूट गया

शेर बेचारा भूखा-प्यासा मारा-मारा फिरता है
शेर की ख़ाला ख़ुश बैठी है भागों छींका टूट गया