Friday, February 25, 2011

सूरत के किस्सा हमरा संग

दिल्ली छोड़ि कअ सूरत आबि गेलहुं।लगभग एक सप्ताह सूरत में रहि चुकल छि । एतेक दिन सअ सभक मुहं सअ गुजरात के बारे में खूब सुनले रहल छलहुं ।मुदा एखन तक गुजरात आबि के मौका हाथ नय लागल छल । तय द्वारे ई बेर जेना गुजरात से एकटा ऑफर आएल । हम मौन मे कलहुं कि ई बेर गुजरात घुमि के आबि छि । कियाक बूढ़ सब कह गेल छथिन्ह कि जतेक बाहर घूम बअ फिरब् ओतेक अनुभव हेतअ। ओनाय हुं दिल्ली लखनऊ रांची और पटना के अलावा दोसर दिशा में कयहों नय गेला पार लागल अछि। मुदा ई बेर हम कलहुं कि नय देश भ्रमण जरूर करबाक चाहि । ओनाय हुं एखन बेरोजगार छलहुं।
ट्रेन जखने गुजरात के सीमा में प्रवेश केलक तखने लागल कि किछु बदलाव भेला । कियाक अपना सभ के तरफ त स्टेशन सब कतेक गंदा रहिय छय । ई कोनों कहअ के बात अछि । एतुका स्टेशन सभ एतेक साफ सुथरा छय कि मौन हेत कि एतेय सुति रहि । रस्ता में गोधरा से हो आएल छल । गोधरा पहुंचल पर 2002 याद आबि गेल । बाद बाकिं हमर ट्रेन राति में साढ़े दस बजे सूरत पहुंचल । राति में सूरत स्टेशन पर संगी सभ आबि गेल छल । खेनाय नय खेने छलहुं । ओनायहों गुजराति खेनाय के बारे में बडड् सुनले छलहुं । मौन में तअ गुजराति खाना के स्वाद अबैत रहां । संगी सभ से हो ई हां गप्प कहला कि चलु गुजरात में शुरूआती एतुका खेनाय सअ करू । हमहुं तपाक सअ हां कहि देलहुं । देरी नय करवाक चाहि । चौबीस घंटा सअ ट्रेन में बैसल बैसल मौन से हो बैचेन भअ गेल छलाह । सामने गुजराती थाली लगावल गेल । सभ पहिले एक चम्मच छोला मुंह में देलउं । मौन भेल कि तुरंत फेकि दी । मुदा अन्न रहिय । कि करतउं । छोला जे रहिय से पूरा मीठ्ठ । आई तक हम खाली मसाला वला छोला खेने रहलउं । ई त नया स्वादक अनुभव रहय हमरा खातिर । गुजरात में अहांक खाना सभ मिरचाई के जगह चीनी आउरी गुड़ मिलाएल जाएत अछि । मुदा आबि हमरो आदत भअ गेल अछि ।
त एहन रहेय गुजरातक पहिल दिन । गुजरात के बारे में अउरों बडड् गप्प अछि जेना जेना काज स् फुरसत भेटत तेना तेना लिखब ।
आगाक किस्सा जारी रहत...अहांक दिलीप झा

Thursday, February 24, 2011

ये स्टार वाले बौरा गए हैं


जी हां लगता हैं स्टार न्यूज़ वाले बौरा गए हैं । कल स्टार न्यूज देख रहा था । ऐसा लगा मानों स्टार न्यूज - आपको रखे आगे ना हो बल्कि स्टार न्यूज - कांग्रेस का मुख पत्र हो । खबरें चाहे कॉमन वेल्थ से जुड़ी हुई हो या फिर बाबा रामदेव से । हर खबर को देखने के बाद ऐसा लगा मानो कोई कांग्रेस का प्रवक्ता अपनी बात रख रहा हो। देश के नंबर दो चैनल से ऐसी उम्मीद तो कोई नहीं रखता हैं । कहा गया हैं मीडिया समाज का दर्पण होता हैं । लेकिन अगर दर्पण ऐसा होता हैं तो फिर दर्पण को साफ करनें की जरूरत हैं । हर तरफ पेड न्यूज का हल्ला हैं । एसी रूम में बैठकर ना जाने जाने क्या भाषम देते हैं । फिर अगले सेकेंड ही शुरू हो जाता हैं पेड न्यूज का खेल । अब ये पेज न्यूज था । या फिर सरकार को खुश करने की कोशिश । ये तो स्टार न्यूज ही जानें । पर एक दर्शक तो खूब समझता हैं । इन चीजों को । मगर बेचारा दर्शक भी करे तो क्या करे । सबको पता हैं । इस लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र की अवाज की कितनी कमजोर है ।

अग्निपथ - हरिवंश राय बच्चन

वृक्ष हों भले खड़े,

हों घने हों बड़े,

एक पत्र छांह भी,

मांग मत, मांग मत, मांग मत,

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ


तू न थकेगा कभी,

तू न रुकेगा कभी,

तू न मुड़ेगा कभी,

कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ


यह महान दृश्य है,

चल रहा मनुष्य है,

अश्रु श्वेत रक्त से,

लथपथ लथपथ लथपथ,

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ-

-- हरिवंश राय बच्चन

Wednesday, February 23, 2011

सूरत ---- २

सूरत आए हुए लगभग एक सप्ताह हो चुका है । इन दिनों में सूरत को थोड़ा बहुत देखा । बाकी काफी व्यस्त रहा इन दिनों । वहीं बहुत दिनों बाद ऑफिस जाने लगा दोबारा । काफी दिनों से खाली बैठा था । शायद ये अच्छा ही था । क्योकिं नौकरी ढूढंने का मुझे कोई अनुभव नहीं था । वो अब हुआ । चलो जो हुआ अच्छा ही हुआ । देर आए दुरूस्त आए । दोबारा वहीं ऑफिस ऑफिस । और वहीं मीटिंग मीटिंग का खेल । पुराने दिनों में एक बार फिर वापसी हुई । पुराने साल की बात करे तो वह खाली मेरे लिए ही नहीं अपितु पूरे देश के लिए खलबली वाला था । पूरा साल झंझावतों से झूलता रहा । लेकिन क्या ये साली जिन्दगी हैं । कोई क्या कर सकता हैं इसमें भला । सब ऊपर वाले की मर्जी है भाई
आगे की कहानी ... जारी रहेगी

Monday, February 21, 2011

सूरत -१


अभी कुछ दिन पहले सूरत आया हूं जैसा सुना था वैसा ही पाया हूं मोदी का समर्थक हूं पर अब ये और बढ़ गई क्या हिदूं या फिर मुस्लमान सभी लोग मोदी के प्रशंसक हैं और हो भी क्यो ना मोटा भाई नें काम ही ऐसा किया हैं लोगों का मानना हैं यहां तक की मैं भी मान रहा हूं यहां पर एक सप्ताह बिताने के बाद भाई रात के ११ बजे भी सूरत में क्या पुरूष क्या महिलाएं सभी लोग बेफ्रिक होके घूमते नजर आते हैं जो ना दिल्ली में देखा ना हीं लखनऊ में लेकिन यहां पर देखा एक आम आदमी के नजरिए से देखे तो ये भी बहुत बड़ी बात हैं रोटी , कपड़ा और मकान के बाद अगर किसी चीज की जरूरत होती हैं तो वो हैं सुरक्षा की। जॉन मास्लो ने भी यही कहा हैं । अपनी हिरारकी थ्योरी में ।
आगे की कहानी ... जारी रहेगी

वापसी

बहुत दिनों बाद आज लिखने का मौका मिला हैं । एक तो सिस्टम की कमी दूसरा हिन्दी फोंट की दिक्कत । पर अब लगता हैं कि लिखने का सिलसिला हमेशा जारी रहेगा ।

Saturday, February 19, 2011

समझौतों की भीड़-भाड़ में सबसे रिश्ता टूट गया

समझौतों की भीड़-भाड़ में सबसे रिश्ता टूट गया
इतने घुटने टेके हमने आख़िर घुटना टूट गया

देख शिकारी तेरे कारन एक परिन्दा टूट गया
पत्थर का तो कुछ नहीं बिगड़ा लेकिन शीशा टूट गया

घर का बोझ उठाने वाले बचपन की तक़दीर पूछ
बच्चा घर से काम पे निकला और खिलौना टूट गया

किसको फ़ुर्सत इस दुनिया में ग़म की कहानी पढ़ने की
सूनी कलाई देखके लेकिन चूड़ी वाला टूट गया

ये मंज़र भी देखे हमने इस दुनिया के मेले में
टूटा-फूटा नाच रहा है, अच्छा ख़ासा टूट गया

पेट की ख़ातिर फ़ुटपाथों पर बेच रहा हूँ तसवीरें
मैं क्या जानूँ रोज़ा है या मेरा रोज़ा टूट गया

शेर बेचारा भूखा-प्यासा मारा-मारा फिरता है
शेर की ख़ाला ख़ुश बैठी है भागों छींका टूट गया