Wednesday, April 20, 2011

हम बेशर्म हैं

राजधानी एक्सप्रेस में लगी आग में जान बचानी की कीमत मात्र तीन हजार रूपये...और विश्व कप के लिए करोड़ों रूपये ऐसे ही चलता रहा तो समाज सवेंदनहीन क्यों नहीं होगा क्यों लोग अपनी जान को खतरे डालेगें ये भी कह सकते हैं कि मानवता हैं पर जब कोई जवान शहीद होता हैं तब कहां घुस जाती हैं मानवता जवाब किसी के पास नहीं हैं क्योकिं एसी कमरे में बकबक करना और अमलीजामा पहनाना अंतर होता हैं आप क्या कहेगें क्योकिं भविष्य हैं आपका भले देश को आप अपना ना मानते हों...
आपको बताते चलूं कि अगर कोई जवान शहीद होता हैं तो उस जवान के घर वालों को महज लाख रूपये दे दिए जाते हैं उस समय कहां चला जाता हैं बीसीसीआई कहां घर में दुबक के भाग जाते हैं वो लोग जो खिलाड़ियों को करोड़ो रूपये देने की वकालत तो करते हैं पर ये सब चीजें उन्हें दिखाई नहीं देती हैं आज तमाम शहीद परिवार ऐसे ही जिन्हे दो वक्त की रोटी भी मुहाल हैं शहीद जवानों के बुजुर्ग माता पिता भीख तक मागंने तक मजबूर हैं तब कहा चले जाते हैं हमारे मान्यवर किसे के पास कोई जवाब नहीं हैं क्योकि यहां जान बहुत सस्ती हैं