Friday, March 30, 2012

यूं मंदिर में जाना

आज मंदिर गया ... जाकर अच्छा लगा...लेकिन एक चीज जो देखने को मिली वह कम अच्छी लगी कि गर्मी आते ही महिलाओं के कपड़े कम हो गए हैं । समझ में नही आया कि मंदिर आया हूं कि या किसी फैशन परेड का हिस्सा बनने...माना कि सबको आजादी हैं और अपने सोच को प्रकट करने का अधिकार हैं । लेकिन ये कैसी आजादी । ये कैसा आधुनिकपन को प्रकट करनें का तरीका । अगर ये तरीका सही हैं तो वो दिन दूर नहीं जब हम भी विदेशी नंगेपन वाली सभ्यता को अपना लेगें । वो दिन दूर नहीं जब भारतीय संस्कृति किताबों में सिमट कर रह जाएगी । और हमारे आने वाली पीढ़ी किताबों में अपने पूर्वजों की संस्कृति को पढ़ेगें ।
हो सकता हैं कि बहुत लोग मेरे बात से सहमत होगें और बहुत सारे लोग ऐसे भी होगें जो सहमत नहीं होगें । लेकिन ये अभिव्यक्ति में शालीनता का ख्याल रखना चाहिए । माना मंदिर में भले लोगों का ध्यान भगवान पर होता हैं लेकिन फिर भी इस तरह के शोबाजी से बचना चाहिए । क्योकिं आप मंदिर आए ना कि कियी पार्टी में शरीक होने के लिए नहीं । आप कह सकते हैं कि ये हमारा अधिकार हम कुछ भी करे । लेकिन इसका मतलब ये नही कि आप फैशनबाजी में नंगे चले आएगें । लोग भले कुछ भी तर्क दें पर तर्क देने से पहले इस पर गौर जरूर फरमाना चाहिए कि क्या ये सही है।