Tuesday, February 4, 2014

कोई हँस रहा है कोई रो रहा है
कोई पा रहा है कोई खो रहा है

कोई ताक में है किसी को है गफ़लत

कोई जागता है कोई सो रहा है

कहीँ नाउम्मीदी ने बिजली गिराई

कोई बीज उम्मीद के बो रहा है

इसी सोच में मैं तो रहता हूँ 'अकबर'

यह क्या हो रहा है यह क्यों हो रहा है
--अकबर इलाहाबादी