Sunday, July 27, 2014

"अंकल मेरी मां के कातिलों को फांसी दिला दो"

"अंकल मेरी मां के कातिलों को फांसी दिला दो"
...जी हैं कुछ ऐसे ही शब्द थे उस मृतक महिला के बेटी के जिसकी मौत पिछले दिनों मोहनलालगंज में हुई थी...आज एक पत्रकार मित्र से मिला...संयोगवश चर्चा मोहनलालगंज वाली घटना पर शुरू हुई...तब उन्होनें बताया कि ऊपर वाले शब्द उस महिला की बेटी नें उनसे कहा था जब वो जीपोओ गए थे...गौरतलब हैं कि उस महिला के  बच्चे और परिवारजन जीपोओ पर सरकार से सीबीआई जांच की मांग को लेकर धरना दे रहे हैं...
17 जुलाई जी हां शायद ये वहीं तारीख हैं जिसकी कल्पना उस मृतका के घरवालों ने कभी नही कि होगी...इधर जहां जहां जा रहा हूं...वहां मोहनलालगंज की घटनी की चर्चा जरूर हुई हैं...अत्यंत लोमहर्षक घटना है...शाटद दिल्ली के निर्भया कांड से भी जादे...और उस पर नमक हमारे हुक्मरानों नें और नौकरशाहों छिड़का है...अगर नौकरशाहों के बयान पर गौर करें तो सिर के सारे बाल उखाड़ते रहेगें आप...हमारे लखनऊ शहर के कप्तान साहब ने तो गजब ढाह दिया हैं...पहले कहा कि गैगरेप हुआ है फिर कहे कि एक्के आदमी का हाथ है...कोई रेप वेप नय हुआ हैं...खैर आज इनके इस बयान को फोरसेंनिक विभाग ने नकार दिया हैं...कप्तान साहब का इतिहास काफी सुनहरा रहा है किसी भी केस को ऐसी तैसी करने में...कल अखबार में कही पढ़ रहा था कि एक बार एक जिले में दंगा हुआ था...और वे वहां पर कप्तान थे और जनाब भाग गए थे...खैर इस घटना के दस दिन हो गए है...तमाम मीडिया रिपोर्ट और बयानों को देखा जाए तो पुलिस चाहती ही नहीं है कि असली सच्चाई जनता के सामने आए...कारण निश्चित कोई रसूखदार हैवान का होना हैं....
इधर अगर आप अखबार का अवलोकन करेगें तो देखेगें कि लखनऊ में लगातार क्राइम का ग्राफ बढ़ता जा रहा हैं...खासकर नए कप्तान साहब के आने के पश्चात ज्यादा...एक आदमी आज इतना असुरक्षित महसूस कर रहा है जिसका बखान नहीं किया जा सकता हैं...
कप्तान साहब से बस एक गुजारिश है कि कृपया लखनऊ को वैसे ही रहने दें...जिससे हम गर्व से कह सके कि “जरा मुस्कुराइये कि आप लखनऊ में हैं”.